Hindi

अकेला..

अकेला..

चलता हूँ इन राहों पे अकेला मैं, पता नही क्यो,कहाँ कब… बस चलता हूँ उन राहों पर जो असीमित है विशाल है ना जाने कहाँ मिलती और कहाँ बिगड़ती है ये, ना जाने कहाँ मुड़ती कहाँ संभलती है ये कभी हंस देता हूँ चलते चलते तो कभी आँसु साथ देते हैं, कभी तिलमिला उठता हूँ [...]

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दुनिया

जब भी लगता है की दुनिया को पहचान चुके हम, नया रूप दिखा देती है ये, जब भी लगता है बस में है, मुट्ठी से रेत की तरह फिसल जाती है ये..   जब भी लगता है सुहाना सफ़र है ये ज़िंदगी, तभी लोगो के असली रूप से मिलवा देती है ये.. जब भी लगता [...]

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Deepavali

I haven’t written anything for long. I am not writing anything new either. Just felt like sharing an old  poem, which some of you might have already heard. फिर आ गयी है दीपावली जगमग है हर घर, जगमग है हर गली| इतनी रोशनी देखकर, रोशनी इतरा उठी और बोली अंधेरे से, कि ए अंधेरे अब [...]

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क्यूँ

क्यूँ

क्यूँ हर शब्द का मतलब पता होना होता है ज़रूरी? क्यूँ भागते रहना यू अंधाधुंध ज़िंदगी में है ज़रूरी? क्यूँ सोचना कल का हर पल होता है ज़रूरी? क्यूँ दुनिया के चक्रव्यूह में फँसना है ज़रूरी? वक़्त के हाथों की कठपुतली बन कर क्यूँ उसकी धुन पर नाचना होता है ज़रूरी? क्यूँ लोगों की बातें सुनते [...]

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अकेला…

अकेला…

कभी कभी अकेले रहने का मन करता है, बस अपने मन को सुनने का ज़ी करता है, इस शोर को शांत रखने को ज़ी करता है, कभी कभी बस खुद से बोलने का जी करता है जब चारो और खामोशी पनपती है, पर मन ज़ोर ज़ोर से शोर मचाता है, कुछ सवाल ये पूछता है [...]

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आशायें

आशायें

    जब सपने सारे टूटने लगे, जब मंजिले सारी छूटने लगे, जब रिश्ते सब हाथ से फिसलने लगे, जब दिल हर पल बैठने लगे, जब ख्वाहिशें भी दिल में ख़त्म हो जाए ,जब सारी उम्मीदें भी कही खो जाए, जब दिन का उजाला ढक कर रात पाव अपने पसारने लगे,   ओर अपना साया [...]

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शायद………..

शायद………..

कुछ सुनना चाहते थे हम शायद, कुछ कहना चाहते थे तुम शायद, मेरी नज़रो से नज़रें मिलाई नहीं तुमने, कुछ छुपाना चाहते थे तुम शायद………..     कशमकश हमारे मन में भी थी, तुम्हारे दिल में भी हो रही थी हलचल शायद, कुछ बातें हो रही थी खामोशियों में, उन बातों का भी था कुछ [...]

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जब छोटा था..

जब छोटा था..

जब छोटा था.. जब छोटा था तो सितारों की तरह चमकना चाहता था इन काले सफेद बादलो मे मैं उड़ना चाहता था दुनिया से मैं कभी डरता नही था हट मनवाने से पहले मैं हटता नही था क्या ताक़त अब इतनी कम है, पता नही? या बादलों मे अब मन नही, पता नही? क्यो दिल [...]

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आज़ादी

आज़ादी

ज़िंदगी ने जकड लिया मुझको, ना जाने किस जाल मैं पकड़ लिया मुझको, जीवन की खुशियाँ मापने लगा मैं, कम,ज़्यादाके तराजू मैं आकने लगा मैं दुनिया से लड़ने की सोचने लगा मैं “मैं”से अब दूर होने लगा मैं ना जाने कब माँ का हाथ पकड़ा था कब ज़ोर से उन्हे जकड़ा था जीवन मैं बस [...]

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बचपन

बचपन

लाल बत्ती के जलते ही ऐसा लगा जैसे वक़्त थम सा गया हो बर्फीली हवाओं की चादर तले जैसे जम सा गया हो एक ऐसा ठहराव जिसमें जरा भी हलचल नहीं एक रेतीला रेगिस्तां और कोई जल-थल नहीं पर इस ठहराव को चीरकर कोई तो था जो बढ़ रहा था मेरी ओर अविराम, अनवरत, निरंतर [...]

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