जैसा मैंने देखा
गहरी काली रात को ढलते हुए देखा है
रौशनी की किरण को निकलते हुए देखा है
क्यूँ ग़म रहे भला बेजां से इन पैरों का
फरिश्तों को भी हमने फिसलते हुए देखा है
सपने छला करते हैं ऐसा सुन रखा था
हमने तो हकीकत को छलते हुए देखा है
क्या हुआ जो वक़्त ने एक पल को दगा दिया
पल-पल यहाँ इंसानों को बदलते हुए देखा है
है इतनी तपिश इस शहर की हवा में
बर्फ को भी ताप से उबलते हुए देखा है
नामुमकिन नहीं है पाटना ऊँच-नीच का भेद यहाँ
सूरज को सागर में मिलते हुए देखा है
जान बाकी हो सकती है एक बेजां सी चीज में
चट्टानों को भी अक्सर मचलते हुए देखा है
मिट जाती हैं मुश्किलें गर हो खुद पर भरोसा
हिम्मत के आगे डर को दहलते हुए देखा है
बदल नहीं सकती मुक्कदर राह की ये ठोकरें
गिर गिर कर लोगों को संभलते हुए देखा है
खूबसूरत सपनों का हक बस पक्के घरों को नहीं
कच्ची छतों पर ख्वाबों को टहलते हुए देखा है
देखा नहीं है ये सब किस्सों में, किताबों में
वक़्त की रफ़्तार पर चलते हुए देखा है !!!
- archana
1 Comment › Leave yours
Leave a Reply
Popular Posts
- The journey to IIT Delhi … 0 comment(s) |
- Seasons in the Sun 0 comment(s) |
- New Delhi vs. Chandigarh 0 comment(s) |
- Top 5 reasons why Abhishe… 0 comment(s) |
- Move To The New Cheese an… 0 comment(s) |






its true about human who face lots of problems in life that poem motivated to him good archana i like ur poem